
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के भूगोल विभाग द्वारा आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन “वैश्विक जलवायु परिवर्तन: लचीला समाज और सतत विकास” का समापन 30 सितंबर 2024 को हुआ। समापन समारोह की शुरुआत पवित्र क़ुरान की आयतों की तिलावत से हुई। इसके बाद प्रो. निज़ामुद्दीन खान (संयोजक और अध्यक्ष, भूगोल विभाग) ने स्वागत भाषण दिया और सभी अतिथियों का स्वागत किया।
समारोह के दौरान औपचारिक संबोधन प्रो. सर्ताज तबस्सुम (डीन, विज्ञान संकाय, एएमयू) ने दिया। उन्होंने सम्मेलन के उद्देश्यों और इसके महत्व पर प्रकाश डाला।
मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित प्रो. अरुण कुमार सिंह (रजिस्ट्रार, बीएचयू, वाराणसी) ने एएमयू और बीएचयू की तुलना करते हुए दोनों संस्थानों की उपलब्धियों की सराहना की। उन्होंने भूगोल के क्षेत्र में प्रो. इनायत सर की पुस्तक ‘बिहार भूगोल’ और प्रो. मूनिस रज़ा (जेएनयू के संस्थापक) का भी जिक्र किया। प्रो. सिंह ने जलवायु परिवर्तन के कारण प्रजातियों और तटीय क्षेत्रों पर बढ़ते ख़तरों की विस्तार से चर्चा की। उन्होंने स्वास्थ्य, ऊर्जा की मांग और आर्थिक विकास जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी अपने विचार रखे।
सम्मेलन के सम्मानित अतिथि प्रो. भगवान सिंह चौधरी (अध्यक्ष, भूगोल विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय) ने अपने भाषण में कहा कि “हम जलवायु परिवर्तन की साक्षी बनने वाली पहली पीढ़ी हैं और इसे रोकने का आखिरी अवसर भी हमारी पीढ़ी के पास है।” उन्होंने नासा द्वारा उपलब्ध कराए गए अवसरों पर भी प्रकाश डाला।
दूसरे सम्मानित अतिथि, प्रो. वी.के. श्रीवास्तव (डीडीयू गोरखपुर विश्वविद्यालय) ने अपने शिक्षकों और एएमयू के साथ अपने संबंधों को याद किया। उन्होंने वर्तमान जलवायु परिवर्तनों को भविष्य की पीढ़ियों के लिए अभिशाप बताया। उन्होंने विज्ञान और शांति के महत्व को भी रेखांकित करते हुए कहा कि “हवा चल रही है, दिया जल रहे हैं।”
समापन सत्र में डॉ. सालेहा जमाल (एसोसिएट प्रोफेसर, भूगोल विभाग) ने तीन दिवसीय सम्मेलन की रिपोर्ट प्रस्तुत की। धन्यवाद ज्ञापन प्रो. निगार आलम सिद्दीकी (संयुक्त आयोजन सचिव) ने किया। कार्यक्रम का समापन एएमयू के ‘ताराना’ और राष्ट्रगान के साथ हुआ।
सम्मेलन का संकल्प:
तीन दिवसीय सम्मेलन के दौरान कई महत्वपूर्ण विषयों पर गहन चर्चा की गई और निम्नलिखित प्रस्ताव पारित किए गए:
1. आधुनिक तकनीक का महत्त्व: जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सटीक आकलन करने में आधुनिक तकनीक की भूमिका महत्वपूर्ण है। दीर्घकालिक समाधान के लिए बहु-विषयक दृष्टिकोण और समग्र तंत्र को अपनाना आवश्यक है।
2. जलवायु-लचीला बुनियादी ढांचा: बाढ़-रोधी इमारतें, नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियाँ और जलवायु-अनुकूल कृषि जैसी बुनियादी ढांचागत योजनाएँ जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए आवश्यक हैं।
3. संसाधन प्रबंधन: प्राकृतिक संसाधनों जैसे पानी, ऊर्जा और वनों का कुशल प्रबंधन कार्बन उत्सर्जन को कम करने और दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है।
4. सामाजिक और पर्यावरणीय जागरूकता: जलवायु परिवर्तन के प्रति शिक्षा और जन जागरूकता लोगों को सतत जीवनशैली अपनाने और नीतियों की वकालत करने में सक्षम बनाती है जो स्थिरता और लचीलापन प्राथमिकता देती हैं।
5. जैवविविधता संरक्षण: पारिस्थितिक तंत्र और जैवविविधता का संरक्षण जलवायु स्थिरता के लिए अनिवार्य है, क्योंकि स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र चरम मौसम की घटनाओं से रक्षा करते हैं।
6. तकनीकी नवाचार: स्वच्छ ऊर्जा, कार्बन कैप्चर, सतत कृषि और हरित परिवहन में नवाचार जलवायु परिवर्तन से निपटने और सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक हैं।
7. वैश्विक सहयोग की आवश्यकता: पेरिस जलवायु समझौते जैसी नीतियों के माध्यम से वैश्विक तापमान वृद्धि को सीमित करने और सतत प्रथाओं को अपनाने के लिए एक ठोस रूपरेखा की आवश्यकता है।
सम्मेलन के दौरान विशेषज्ञों ने इन सभी पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की और उन्हें सम्मेलन के प्रमुख प्रस्तावों के रूप में स्वीकार किया।